मिलने को दिल बेताब है
पर आप शराफत पे अमादा हैं
तक़ल्लुफ़ ना कीजिये तख्तपोश पे बैठाने का
अब तो खिड़की फांद कर ही आने का इरादा है

नज़ाकत नूर की
नज़्म पुखराज की
पोशीदगी कम्बख्त उम्र की
मगर नफासत हमारे इंतज़ार की

बेज़ुबाँ वो हुई
सहम मैं गया
खामोश उनकी चौखट
सन्नाटा मेरे यहाँ
दर्द उनका छलका
धड़कन मेरी रवां

हर कूचे में आशियाँ बसाया
इस अंधेर-नगरी में इक इबादत का दिया जलाया
लाचार के दामन में ही अपना तकिया सजाया
उसकी पस्मंदगी को मैंने ईमान की तरह अपनाया
मगर फिर भी ना इस बेघर के कर्ब को कोई समझ पाया
उन्होंने तो बस वतन की उल्फत को अपना पैमाना बनाया
शुक्र है! सिर्फ नूर की जुल्फों में ही मेरा प्यार लहलहाया
दर्द उसका अपना कर जैसे अल्लाह भी मेरे करीब आया

माना के तेरी कवायत का मकसद अब कुछ और है
ख्वाब, और उसमें तेरा आना
इस पर भी क्या चला किसी का ज़ोर है?

अगर नज़र तेरी डूबते हुए सूरज पे है
साहिल पे जो मोती टिम-टिमा रहा है
तू उसको भी रवां कर दे

The revolutionary will eventually fall silent
He won’t care, but only pretend
His war cries would mark no epoch
Memories that won’t heal, but rather mock
With bullets lodged so deep
They’ll leave no wound to fester, no pain to weep

क्रांतिकारी भी मूक हो जाएगा
नाश-मानसिक्ता से बेसुध हो जाएगा
कोई ज़ख्म नहीं बचेंगे जब टटोलने के लिए
सिर्फ़ इक कोरा इंकलाबी-पर्चा खोलने के लिए