दिल्ली का दलाल बन गया हूँ
गरीब का निवाला ना सही
अमीर की इज्ज़त ना सही
चोर फिर भी हूँ
टूटे दिल का मलाल बन गया हूँ
दिल्ली का दलाल बन गया हूँ

सब्ज़ वादियों पर फैली चिलमिली धूप
मैं हूँ

सुर्ख आखों की हदों पर बिखरता काजल
भी मैं ही हूँ

बेज़ुबाँ वो हुई
सहम मैं गया
खामोश उनकी चौखट
सन्नाटा मेरे यहाँ
दर्द उनका छलका
धड़कन मेरी रवां

मिलने को दिल बेताब है
पर आप शराफत पे अमादा हैं
तक़ल्लुफ़ ना कीजिये तख्तपोश पे बैठाने का
अब तो खिड़की फांद कर ही आने का इरादा है

नज़ाकत नूर की
नज़्म पुखराज की
पोशीदगी कम्बख्त उम्र की
मगर नफासत हमारे इंतज़ार की

बेज़ुबाँ वो हुई
सहम मैं गया
खामोश उनकी चौखट
सन्नाटा मेरे यहाँ
दर्द उनका छलका
धड़कन मेरी रवां

हर कूचे में आशियाँ बसाया
इस अंधेर-नगरी में इक इबादत का दिया जलाया
लाचार के दामन में ही अपना तकिया सजाया
उसकी पस्मंदगी को मैंने ईमान की तरह अपनाया
मगर फिर भी ना इस बेघर के कर्ब को कोई समझ पाया
उन्होंने तो बस वतन की उल्फत को अपना पैमाना बनाया
शुक्र है! सिर्फ नूर की जुल्फों में ही मेरा प्यार लहलहाया
दर्द उसका अपना कर जैसे अल्लाह भी मेरे करीब आया