कच्चे राह की तरफ़ चलते हुए
दूर जलती रोशनी को देखा है?
उस रोशनी के गिरेबां में दफ्न
इक भूले हुए पीरज़ादे की मज़ार हूँ मै.

थके हुए मुसाफिर को
ठंडी हवा का लुत्फ़ उठाते देखा है?
उस आखिरी मोड़ पर
बरगद की छांव तले सोते हुए
राहगीर का मीठा ख्वाब हूँ मैं.

तालीमीं शोर के बीच
मुस्कुराते हुए इमाम को देखा है?
मुफसिर के तफसीर से रंगी हुई
उस मदरसे की पाक-सफ़ेद दीवार हूँ मै.

इक खुली किताब हूँ मैं
इक नई कुरान हूँ मै.

– 2005

अपने ही मल से गंदे किए बिस्तर में रहते हैं सोए
जब तक न बोले अरुंधति रॉय

इस कायनाती शामियाने के तले
तितर-बितर हुई
छलकती किरणों के घेरे में
खड़ी थी वो

ना राह ढूँढने की चाह
ना उससे भटकने की
ना की कारवाँ से रुकने की इल्तजा
ना कोशिश उससे बिछड़ने की

दिल्ली का दलाल बन गया हूँ
गरीब का निवाला ना सही
अमीर की इज्ज़त ना सही
चोर फिर भी हूँ
टूटे दिल का मलाल बन गया हूँ
दिल्ली का दलाल बन गया हूँ

सब्ज़ वादियों पर फैली चिलमिली धूप
मैं हूँ

सुर्ख आखों की हदों पर बिखरता काजल
भी मैं ही हूँ

बेज़ुबाँ वो हुई
सहम मैं गया
खामोश उनकी चौखट
सन्नाटा मेरे यहाँ
दर्द उनका छलका
धड़कन मेरी रवां