दाने चुगता परिंदा
जैसे पल गिन रहा है
असीम नीला आसमां
जैसे वक़्त का पैमाना हो

— पुखी उर्फ़ पाखी

19th June, 2020

शाम का धुआँ क़ायम है
और दिल भी वैसे जल रहा है
चाँद की सियाही उतनी ही फ़ीकी है
और ज़िन्दगी का कोरा पन्ना भी पलट रहा है
हवा ने लगायी वही पुरानी गुहार
और चौखट की रुस्वाई भी है बरक़रार

— पुखी उर्फ़ पाखी

3rd August, 2019

ग़रीब नवाज़
के बेशक़ीमती अलफ़ाज़
अल्फाज़ो के दायरे में
छुपा इक सच है
जो लम्हों की अशर्फ़ियों से कभी ख़रीदा न गया

— पुखी उर्फ़ पाखी

31st July, 2019

ख्वाबों से ज़िन्दगी की सच्चाई नहीं देखी जाती
अफसानों से यादों की रुस्वाई नहीं देखी जाती
जैसे परिंदों से हवा की रहनुमाई नहीं देखी जाती
और बादलों से समंदर की गहराई नहीं देखी जाती

— पुखी उर्फ़ पाखी

13th August, 2019

ख्यालों के बवंडर में
गुम हुए अलफ़ाज़
यादों के समंदर में
डूब गए एहसास

— पुखी उर्फ़ पाखी

5th July, 2019

झुर्रियों वाली आँटियाँ
मेट्रो में
हनुमान चालीसा पढ़ती हैं
और ऊपर से
मोदी का जहाज़ निकल जाता है

उम्र का तकाज़ा किये नहीं होता
आशिक़ के जनाज़े में कोई नहीं रोता
कब्र पर चादर चढ़ा कहें – –
इंसान अच्छा था
पर साला इश्क़ज़ादा फिर भी कच्चा था