उम्र का तकाज़ा किये नहीं होता
आशिक़ के जनाज़े में कोई नहीं रोता
कब्र पर चादर चढ़ा कहें – –
इंसान अच्छा था
पर साला इश्क़ज़ादा फिर भी कच्चा था

है रात की साज़िश पुरानी
मुझे दिखती है इसमें नूर की शैतानी
उपर से चाँद करे आना-कानी
म़ैं बादल, और ऐसी है मेरी कहानी

मुरीद का इश्क़ अगर सच्चा है
तो नशा भी माफ है

‘गर वो इश्क़ नहीं, बंदगी है
तो काफ़िर का दिल भी सॉफ है

इंकलाब की धधकती लू
कभी-कभी
ऐ.सी. ऑफिस क्यूबिकल के मुहाने पर
सरकते हुए
कनपट्टी के नीचे लगती है
दिल को रवानगी
और आँख को शैतानी चमक से भर देती है

छोड़ना सीख लिया है
रंगरेज़ ने रंगों को निचोड़ना सीख लिया है

कच्चे राह की तरफ़ चलते हुए
दूर जलती रोशनी को देखा है?
उस रोशनी के गिरेबां में दफ्न
इक भूले हुए पीरज़ादे की मज़ार हूँ मै.

थके हुए मुसाफिर को
ठंडी हवा का लुत्फ़ उठाते देखा है?
उस आखिरी मोड़ पर
बरगद की छांव तले सोते हुए
राहगीर का मीठा ख्वाब हूँ मैं.

तालीमीं शोर के बीच
मुस्कुराते हुए इमाम को देखा है?
मुफसिर के तफसीर से रंगी हुई
उस मदरसे की पाक-सफ़ेद दीवार हूँ मै.

इक खुली किताब हूँ मैं
इक नई कुरान हूँ मै.

– 2005

अपने ही मल से गंदे किए बिस्तर में रहते हैं सोए
जब तक न बोले अरुंधति रॉय