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हुआ तो सही
हुस्न-ऐ-हक़ीक़ी का दीदार
क्या थीं वो डूबते सूरज की लाली
यां गर्म हवा को सहता रुख़सार?
इक तो आलम दर्दनाक़
ऊपर से न मैं था तैयार
फ़िर क्या?
ख्यालों की हदों पे
बन गयी लफ़्ज़ों की दीवार
…बस वहीं चुनवा दिया प्यार

Husn-e-Haqiqi

— पुखी उर्फ़ पाखी

2nd July, 2020