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शाम का धुआँ क़ायम है
और दिल भी वैसे जल रहा है
चाँद की सियाही उतनी ही फ़ीकी है
और ज़िन्दगी का कोरा पन्ना भी पलट रहा है
हवा ने लगायी वही पुरानी गुहार
और चौखट की रुस्वाई भी है बरक़रार

— पुखी उर्फ़ पाखी

3rd August, 2019