कच्चे राह की तरफ़ चलते हुए
दूर जलती रोशनी को देखा है?
उस रोशनी के गिरेबां में दफ्न
इक भूले हुए पीरज़ादे की मज़ार हूँ मै.

थके हुए मुसाफिर को
ठंडी हवा का लुत्फ़ उठाते देखा है?
उस आखिरी मोड़ पर
बरगद की छांव तले सोते हुए
राहगीर का मीठा ख्वाब हूँ मैं.

तालीमीं शोर के बीच
मुस्कुराते हुए इमाम को देखा है?
मुफसिर के तफसीर से रंगी हुई
उस मदरसे की पाक-सफ़ेद दीवार हूँ मै.

इक खुली किताब हूँ मैं
इक नई कुरान हूँ मै.

– 2005