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हर कूचे में आशियाँ बसाया
इस अंधेर-नगरी में इक इबादत का दिया जलाया
लाचार के दामन में ही अपना तकिया सजाया
उसकी पस्मंदगी को मैंने ईमान की तरह अपनाया
मगर फिर भी ना इस बेघर के कर्ब को कोई समझ पाया
उन्होंने तो बस वतन की उल्फत को अपना पैमाना बनाया
शुक्र है! सिर्फ नूर की जुल्फों में ही मेरा प्यार लहलहाया
दर्द उसका अपना कर जैसे अल्लाह भी मेरे करीब आया